गेवरा-दिपका में कोयला डस्ट का कोहराम, बीमारियों की चपेट में 22 हजार लोग, रिसर्चर भी परेशान

Anil Jatwar
6 Min Read

स्थानीय लोगों का कहना है कि खुले ट्रकों से कोयला ढुलाई, डंपिंग यार्ड से उड़ती धूल और नियमित पानी छिड़काव की कमी के कारण पूरा क्षेत्र प्रदूषण की चपेट में है. बच्चों का बाहर खेलना, बुजुर्गों का मॉर्निंग वॉक और महिलाओं का घर से निकलना लगभग बंद हो चुका है. लोगों के लिए सांस लेना तक मुश्किल हो गया है.

गेवरा/दीपका/सीजी एनएन 24 न्यूज : कोरबा जिले के गेवरा/दीपका में स्थित आवासीय परिसर ऊर्जानगर, बी-टाइप, आजाद चौक, बी-वन, डी.ए.वी स्कूल और सरस्वती शिशु मंदिर स्कूल समेत लगभग पाँच किलोमीटर के दायरे में रहने वाली करीब 22 हजार आबादी इन दिनों गंभीर प्रदूषण संकट से जूझ रही है. एस.ई.सी.एल के गेवरा-दीपका क्षेत्र में चल रहे कोयला उत्खनन, ओवरबर्डन डंपिंग यार्ड और कोयला ढुलाई के दौरान उड़ने वाली काली धूल ने पूरे इलाके को अपनी चपेट में ले लिया है. हालात इतने खराब हो चुके हैं कि बच्चे, महिलाएं और बुजुर्ग 24 घंटे घरों में रहने को मजबूर हैं।

महिलाओं का घर से निकलना लगभग बंद
स्थानीय लोगों का कहना है कि खुले ट्रकों से कोयला ढुलाई, डंपिंग यार्ड से उड़ती धूल और नियमित पानी छिड़काव की कमी के कारण पूरा क्षेत्र प्रदूषण की चपेट में है. बच्चों का बाहर खेलना, बुजुर्गों का मॉर्निंग वॉक और महिलाओं का घर से निकलना लगभग बंद हो चुका है. लोगों के लिए सांस लेना तक मुश्किल हो गया है।
स्वास्थ्य पर गंभीर असर
स्थानीय एन.सी.एच चिकित्सक के अनुसार, गेवरा क्षेत्र की खदानों और ओवरबर्डन डंपिंग से उठने वाली काली धूल हवा, पानी और मिट्टी—तीनों को जहरीला बना रही है. दमा, टीबी, आंखों में जलन, त्वचा रोग, सर्दी-खांसी और फेफड़ों से जुड़ी बीमारियों के मरीज लगातार बढ़ रहे हैं. खनन से निकलने वाला दूषित पानी नालों और भूजल में मिल रहा है, जिससे लोग मजबूरी में प्रदूषित पानी पीने को विवश हैं।

बच्चों पर सबसे ज्यादा खतरा
गेवरा/दीपका क्षेत्र के आसपास स्थित जैसे DAV स्कूल, सरस्वती शिशु मंदिर और प्ले-स्कूल गुरुद्वारा में पढ़ने वाले छोटे बच्चे प्रदूषण से सबसे ज्यादा प्रभावित हैं. स्कूलों के छात्रों का कहना है की कोयला डस्ट के कारण स्कूल के आसपास चलना भी मुश्किल हो गया है. न लोग घर से बाहर निकल पा रहे हैं और न ही नियमित वॉक कर पा रहे हैं. उन्होंने जिला प्रशासन से खनन कंपनियों पर सख्ती बरतने और नियमों के अनुसार पानी छिड़काव व ढकी हुई ढुलाई सुनिश्चित कराने की मांग की है, एक और छात्रा का कहना है कि गेवरा-दीपका क्षेत्र में प्रदूषण अब लोगों की दिनचर्या का हिस्सा बनता जा रहा है. छह घंटे स्कूल में बिताने के बाद कुल्ला करने पर काला मलबा निकलना आम बात हो गई है. स्कूल की ड्रेस, क्लासरूम और परिसर हर समय धूल से भरे रहते हैं।

सिंफर के वैज्ञानिक भी चिंतित
सिंफर के एक वैज्ञानिक  ने बताया कि जब शोध संस्थानों में काम करने वाले वैज्ञानिक इस प्रदूषण से परेशान हैं, तो आम लोगों की स्थिति का अंदाजा लगाया जा सकता है. एक समय हरियाली से भरा गेवरा-दीपका आज डंपिंग यार्ड के पहाड़ों और कोयला डस्ट से घिर चुका है. हालात ऐसे हैं कि कोविड काल की तरह मास्क पहनकर ही बाहर निकलना पड़ रहा है. यदि स्थिति नहीं सुधरी तो लोगों को पलायन तक करना पड़ सकता है।

मरीजों की बढ़ती परेशानी
गेवरा/दीपका में मौजूद अस्थमा और दमा रोगियों का कहना है की बीते एक महीने से घर से निकलना मुश्किल हो गया है. कोयला डस्ट के कारण सांस की समस्या और गंभीर होती जा रही है. बुजुर्ग घर से बाहर नहीं निकल पा रहे, कपड़े बाहर सुखाना मुश्किल हो गया है और बच्चे भी घरों में कैद हैं. कई बार शिकायत के बावजूद खनन कंपनियां नियमों की अनदेखी कर रही हैं, जिससे घरों के अंदर तक काली धूल जमा हो रही है।

स्कूलों पर बढ़ा अतिरिक्त बोझ
प्रदूषण से निपटने के लिए स्कूलों और स्थानीय लोगों को अपने स्तर पर बार-बार पानी छिड़काव करना पड़ रहा है. स्कूल परिसरों की सफाई के लिए रोजाना कई ट्रैक्टर पानी खर्च हो रहा है, जिसे निजी खर्च पर खरीदा जा रहा है. यदि हालात जल्द नहीं सुधरे तो आने वाले समय में अस्थमा और फेफड़ों से जुड़ी बीमारियों के मामलों में और बढ़ोतरी की आशंका है.

कोयला डस्ट से होने वाली प्रमुख बीमारियां
कोयला डस्ट प्रदूषण से होने वाली प्रमुख बीमारियों की बात करें तो कोल वर्कर न्यूमोकोनियोसिस (CWP) जिसे आमतौर पर ब्लैक लंग डिज़ीज़ कहा जाता है, दमा (अस्थमा), क्रॉनिक ब्रोंकाइटिस, टीबी (क्षय रोग), फेफड़ों की कार्यक्षमता में कमी, आंखों में जलन और कंजक्टिवाइटिस, त्वचा रोग और एलर्जी, सर्दी-खांसी और सांस की तकलीफ, हृदय रोग का खतरा, एनीमिया और कमजोरी, मानसिक तनाव और अनिद्रा शामिल हैं।
स्थानीय लोगों की मांग है कि जिला प्रशासन, प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड और एसईसीएल मिलकर नियमों का सख्ती से पालन कराएं, ताकि इस क्षेत्र को पर्यावरणीय आपदा बनने से रोका जा सके और लोगों को स्वस्थ जीवन मिल सके।

हवा में धूल के कड़ शामिल है
Share This Article