बिलासपुर/कोरबा: छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा है कि यदि किसी कर्मचारी को विभागीय पदोन्नति समिति (DPC) की गलती या नियमों की अनदेखी के कारण पदोन्नति मिलती है, तो शासन को उस त्रुटि को सुधारने और कर्मचारी को उसके मूल पद पर वापस भेजने का पूरा अधिकार है। अदालत ने स्पष्ट किया कि गलत तरीके से मिली पदोन्नति पर लंबे समय तक काम करने से कोई स्थायी या कानूनी अधिकार उत्पन्न नहीं होता।
यह मामला कोरबा निवासी हीरमन दास महंत और रायगढ़ निवासी विद्याभूषण शुक्ला से जुड़ा है। दोनों को 12 अप्रैल 2023 को जल संसाधन विभाग में जीप ड्राइवर से मैकेनिक ग्रेड-2 के पद पर पदोन्नत किया गया था। करीब तीन साल तक इस पद पर कार्य करने और वरिष्ठता सूची में नाम दर्ज होने के बाद 25 जून 2026 को विभाग ने उनकी पदोन्नति निरस्त कर उन्हें मूल पद पर वापस भेज दिया।
दोनों कर्मचारियों ने हाईकोर्ट में याचिका दायर कर तर्क दिया कि उन्होंने पूरी चयन प्रक्रिया नियमानुसार पूरी की थी और उनकी ओर से किसी प्रकार की धोखाधड़ी नहीं हुई थी। उनका कहना था कि तीन साल बाद बिना विभागीय जांच के पदावनति करना प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के विपरीत है।
राज्य सरकार ने अदालत में कहा कि डीपीसी ने पात्रता संबंधी नियमों की अनदेखी करते हुए पदोन्नति की सिफारिश की थी। इसलिए यह किसी कर्मचारी को दंडित करने का मामला नहीं, बल्कि प्रशासनिक गलती को सुधारने की कार्रवाई थी। साथ ही कर्मचारियों को कारण बताओ नोटिस देकर उनका पक्ष सुनने के बाद ही अंतिम आदेश जारी किया गया।
जस्टिस बीडी गुरु की एकलपीठ ने विभाग के पक्ष को सही मानते हुए कहा कि गलत प्रक्रिया से दी गई पदोन्नति को वापस लेना पूरी तरह वैध है। कोर्ट ने कर्मचारियों की याचिका खारिज करते हुए पदोन्नति निरस्तीकरण के आदेश को बरकरार रखा।
तीन साल बाद भी रद्द हो सकता है गलत प्रमोशन, हाईकोर्ट ने विभाग के फैसले को माना सही
